जीवन जीने की अनुपम विधा है। जो व्यक्ति श्रद्धा और आस्था को अपने भीतर समेटकर समर्पण से कार्य करता है वहि सचे अर्थो में त्यागी है, तपस्वी है और प्रभु का प्यारा है। त्याग एक ऐसा पुष्प है जिसकी सुगंध कभी मलीन नहीं होती। गुरुवर सुधांशुजी महाराज के प्रवचनांश
दुनिया में जहाँ विनम्रता से कार्य बनता है वहां कभी उग्र नहीं होना चाहिए। लेकिन जब सारे रस्ते बंद हो जाये थो फिर डटकर मुकाबला भी करना ज़रूरी होता है। परन्तु भगवान् श्री राम की सेना की तरह संगठित होकर ही आप अन्याय, अत्याचार, पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।